बुधवार को पेश आम बजट ने देश में बजट की नई परंपरा की शुरुआत की है.विपक्षी दलों का कहना था कि बजट को पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों की समाप्ति के बाद पेश किया जाए लेकिन चुनाव आयोग द्वारा हरी झंडी मिलने के बाद सरकार ने एक फरवरी को बजट पेश किया, चुनाव आयोग ने सरकार को सलाह दी है कि बजट में इन पांच राज्यों से संबंधित घोषणाएं न की जाएं. यदि सरकार विपक्ष की बात मान लेती तो बजट आठ मार्च को मतदान समाप्त होने के बाद कभी भी पेश किया जा सकता था. अतीत में भी ऐसे मिसालें हैं जब बजट 12 मार्च को पेश किया गया लेकिन सरकार का तर्क है कि वह बजट पेश करने और उसके पारित होने की प्रक्रिया को 31 मार्च से पहले-पहले पूरा कर लेना चाहती है ताकि एक अप्रैल को नया वित्त वर्ष शुरू होते ही बजट के प्रावधान लागू किए जा सकें.इधर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के उपाध्यक्ष ने बजट को शेरो-शायरी वाला बजट करार दिया है तो आर्थिक विशेषज्ञ इन तर्कों से संतुष्ट नहीं हैं, खासकर उस स्थिति में जब स्वयं सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक नोटबंदी के बारे में प्रामाणिक आंकड़े देने में असमर्थ हैं. नोटबंदी के कारण अर्थव्यवस्था में आई अनिश्चितता के कारण भी बजट तैयार करने की प्रक्रिया पहले से अधिक कठिन हो गई है. बजट तैयार करने में चालू वित्त वर्ष और आने वाले वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय संभावनाओं के आकलन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. यदि चालू वित्त वर्ष एक सामान्य वर्ष होता, तब भी एक माह पहले बजट पेश करने में जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता वे काफी गंभीर होतीं क्योंकि सिर्फ सात-आठ माह के लिए प्राप्त आंकड़ों के आधार पर ही पूरे वित्त वर्ष के लिए जीडीपी की विकास दर, कर राजस्व की उगाही और सार्वजनिक व्यय आदि का आकलन करना पड़ता. फिर यह चालू वित्त वर्ष तो नोटबंदी के कारण नितांत असामान्य वित्त वर्ष बन गया है क्योंकि नकदी की कमी के कारण अर्थव्यवस्था के अनेक क्षेत्रों पर बहुत भारी असर पड़ा है जिसका ठीक-ठीक अनुमान लगाया जाना बाकी है. केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने जो आंकड़े जारी किये हैं, उनमें नोटबंदी के असर को शामिल नहीं किया गया है.