वैश्विक ऊर्जा बाजार में भू-राजनीतिक तनावों और आपूर्ति बाधाओं के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें छह हफ्तों के रिकॉर्ड स्तर को पार करते हुए $100 प्रति बैरल के पास पहुँच गई हैं। ओपेक प्लस (OPEC+) देशों द्वारा उत्पादन में कटौती और प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों में उत्पन्न व्यवधानों ने वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट की चिंताओं को बढ़ा दिया है। तेल की कीमतों में आए इस अचानक उछाल से दुनिया भर के वित्तीय बाजार में हड़कंप मच गया है।
भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ना एक बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड महंगा होता है, देश का आयात बिल (Import Bill) बढ़ जाता है। इससे भारत के चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) पर सीधा दबाव पड़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट आती है।
कच्चे तेल में तेजी का सीधा असर घरेलू महंगाई पर पड़ता है। हालांकि सरकारी तेल कंपनियां तुरंत खुदरा कीमतों (पेट्रोल-डीजल) में बढ़ोतरी से बचने की कोशिश करती हैं, लेकिन यदि क्रूड लंबे समय तक $100 के ऊपर बना रहता है, तो ईंधन की कीमतें बढ़ाना अपरिहार्य हो जाएगा। डीजल महंगा होने से माल ढुलाई (Freight Cost) महंगी होगी, जिससे फल, सब्जियाँ और दैनिक उपभोग की सभी वस्तुएं महंगी हो जाएँगी।
आरबीआई और नीति निर्माताओं के लिए यह स्थिति और भी पेचीदा हो जाती है। जब तेल की वजह से महंगाई बढ़ती है, तो केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों में कटौती रोकने या उन्हें बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ता है। ब्याज दरें ऊंची रहने से होम लोन, ऑटो लोन महंगे होते हैं, जिससे बाजार में उपभोक्ता मांग घटती है और आर्थिक विकास की रफ्तार सुस्त पड़ सकती है।
इस स्थिति से निपटने के लिए भारत को अपनी दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति को तेजी से लागू करना होगा। एथेनॉल ब्लेंडिंग, इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के तेजी से अपनाने और नवीकरणीय ऊर्जा (सौर व पवन ऊर्जा) के विस्तार से ही भारत की कच्चे तेल पर निर्भरता को कम किया जा सकता है। यह ऊर्जा संकट भारत के लिए हरित ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ने का एक मजबूत अवसर भी प्रदान करता है।