Cult Current
राजनीति

अरावली पहाड़ियों के संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा फैसला: 30 नवंबर तक रिपोर्ट सौंपने की अंतिम चेतावनी

7 सितंबर 2026 को सर्वोच्च अदालत ने भारत के सबसे प्राचीन और नाजुक पर्वत तंत्र 'अरावली' के संरक्षण को लेकर एक ऐतिहासिक और बेहद कड़ा रुख अपनाया।

08 Sep 2026
Solar farm during sunset

7 सितंबर 2026 को सर्वोच्च अदालत ने भारत के सबसे प्राचीन और नाजुक पर्वत तंत्र 'अरावली' के संरक्षण को लेकर एक ऐतिहासिक और बेहद कड़ा रुख अपनाया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya Kant) की अध्यक्षता वाली पीठ ने अरावली पहाड़ियों की एक समान परिभाषा और सीमाएं तय करने के लिए गठित उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें रिपोर्ट सौंपने के लिए 6 महीने का अतिरिक्त समय मांगा गया था। अदालत ने समिति की ढिलाई पर कड़ा एतराज जताया और साफ शब्दों में आदेश दिया कि 30 नवंबर 2026 तक अंतिम रिपोर्ट हर हाल में पेश की जाए।  

अदालत की यह तीखी प्रतिक्रिया इसलिए आई क्योंकि विशेषज्ञ समिति ने रिपोर्ट सौंपने की समय सीमा को फरवरी 2027 तक बढ़ाने की मांग की थी। पीठ ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि रिपोर्ट में अनावश्यक देरी से भू-माफियाओं, अवैध खननकर्ताओं और अनियंत्रित निर्माण करने वालों को फायदा पहुंचता है। मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि "समिति दिन-रात काम करे और दो महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपे। यदि वे सक्षम नहीं हैं, तो हम समिति का पुनर्गठन कर देंगे।" अदालत ने स्पष्ट किया कि अनिश्चितकालीन देरी से पर्यावरण को अपूरणीय क्षति हो रही है।  

अरावली पर्वतमाला राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में फैली हुई है और यह उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करती है। यह थार रेगिस्तान के प्रसार को रोकती है और क्षेत्र के भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद करती है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में अनियंत्रित खनन, जंगलों की कटाई और अवैध निर्माणों के कारण अरावली पहाड़ियों का एक बड़ा हिस्सा गायब हो चुका है। एक स्पष्ट कानूनी परिभाषा के अभाव में अरावली के दायरों को लेकर भ्रम बना हुआ था, जिसका फायदा उठाकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जा रहा था।  

सुप्रीम कोर्ट ने समिति को निर्देश दिया है कि वह राजस्थान और गुजरात के स्थानीय जनजातीय समुदायों (Tribal Communities) तथा अन्य हितधारकों की बातें भी सुने और उनकी आजीविका व अधिकारों का ध्यान रखते हुए अपनी सिफारिशें तैयार करे। इसके अलावा, अदालत ने तात्कालिक और गंभीर मुद्दों पर अंतरिम सिफारिशें देने की छूट भी समिति को दी है, ताकि अंतिम रिपोर्ट का इंतजार किए बिना अवैध गतिविधियों पर रोक लगाई जा सके।  

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला भारत के पर्यावरण कानून के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। नौकरशाही की लालफीताशाही और ढुलमुल रवैये पर न्यायपालिका का यह प्रहार दर्शाता है कि प्राकृतिक धरोहरों की रक्षा के लिए अब कोई बहाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 30 नवंबर तक आने वाली यह रिपोर्ट तय करेगी कि अरावली का अस्तित्व बचेगा या फिर वह कॉर्पोरेट और खनन माफिया के दबाव में हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।