नेपाल और तिब्बत के सीमावर्ती हिमालयी क्षेत्रों में प्रकृति के विनाशकारी प्रकोप ने विकराल रूप ले लिया है। अगस्त के अंत में नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बर्फ और चट्टानों के खिसकने (Ice-Rock Avalanche) से उत्पन्न हुई अचानक आई बाढ़ (Flash Floods) और भूस्खलन के कारण नेपाल में मरने वालों की संख्या बढ़कर 1,355 हो चुकी है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, करीब 4,996 लोग अभी भी लापता हैं, जिनमें सैकड़ों विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। भोटेकोशी नदी के उफान ने दर्जनों बस्तियों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को पूरी तरह तबाह कर दिया है।
आपदा की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चितवन, नवलपरासी और नुवाकोट जैसे जिलों में तबाही के खौफनाक मंजर देखने को मिल रहे हैं। जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों (Tunnels) में काम कर रहे सैकड़ों मजदूर पानी और मलबे के बीच फंस गए थे। इस मानवीय संकट को देखते हुए नेपाल की सुरक्षा सेनाओं के साथ-साथ भारत और चीन की विशेषज्ञ राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया टीमों को भी बड़े पैमाने पर खोज और बचाव (Search & Rescue) अभियान में लगाया गया है। अब तक 13,000 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है।
यह भयावह त्रासदी केवल नेपाल तक सीमित नहीं रही, बल्कि सीमा पार चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में भी कम से कम 43 लोगों की मौत हुई और 500 से अधिक लोग लापता हैं। हिमालयी जलमार्गों के जरिए यह तबाही भारतीय राज्यों (बिहार और उत्तर प्रदेश) के सीमावर्ती क्षेत्रों को भी प्रभावित कर रही है। भारत सरकार ने तुरंत राहत सामग्री, चिकित्सा दल और इंजीनियरिंग सहायता भेजकर पड़ोसी देश नेपाल के प्रति अपनी एकजुटता जताई है।
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और वैश्विक तापमान में वृद्धि (Global Warming) के कारण उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और मौसम का मिजाज अत्यधिक अनिश्चित हो गया है। नाजुक ढलानों पर बिना किसी पर्यावरणीय अध्ययन के किए गए भारी निर्माण और बांध परियोजनाओं ने इस खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है। नेपाल की यह आपदा इस बात की सीधी चेतावनी है कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र अब मानव निर्मित दबाव को झेलने की स्थिति में नहीं है।
नेपाल में आई यह आपदा दक्षिण एशियाई देशों के लिए एक गंभीर सबक है। तात्कालिक राहत और बचाव कार्यों के बाद सबसे बड़ी चुनौती प्रभावित लाखों लोगों का पुनर्वास और बुनियादी ढांचे का पुननिर्माण होगा। इसके साथ ही, भारत, नेपाल और चीन जैसे देशों को मिलकर एक मजबूत 'क्रॉस-बॉर्डर अर्ली वार्निंग सिस्टम' (सीमा पार आपदा पूर्व सूचना प्रणाली) तैयार करना होगा ताकि भविष्य में जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले ऐसे विनाशकारी खतरों से जान-माल का नुकसान कम से कम किया जा सके।