अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व भूचाल आया है, जहाँ अमेरिकी डॉलर (US Dollar) का दशकों पुराना वैश्विक वर्चस्व अचानक डगमगाता नजर आ रहा है। ब्रिक्स (BRICS) देशों के रणनीतिक विस्तार और वैश्विक दक्षिण के देशों द्वारा आपसी व्यापार के लिए स्थानीय मुद्राओं के उपयोग के फैसलों ने वाशिंगटन के वित्तीय गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। दुनिया भर की उभरती अर्थव्यवस्थाएं अब अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीतियों और वाशिंगटन द्वारा लगाए जाने वाले मनमाने आर्थिक प्रतिबंधों से बचने के लिए अपनी अर्थव्यवस्थाओं को डॉलर के प्रभाव से मुक्त कराने में जुट गई हैं।
अमेरिकी डॉलर के दबदबे को कमजोर करने के लिए रूस, चीन, ब्राजील, ईरान और कई खाड़ी देशों ने कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और अन्य महत्वपूर्ण धातुओं का व्यापार अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में करना शुरू कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली 'स्वीफ्ट' (SWIFT) के विकल्प के रूप में नए डिजिटल भुगतान नेटवर्क और ब्लॉकचेन आधारित करेंसी सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं। पश्चिमी देशों द्वारा दूसरे देशों की विदेशी मुद्रा संपत्तियों को जब्त करने की आक्रामक नीति ने वैश्विक केंद्रीय बैंकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि केवल डॉलर में अपना रिजर्व रखना अब सुरक्षित नहीं रहा, जिसके कारण दुनिया भर में सोने की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है।
यदि वैश्विक रिजर्व करेंसी के रूप में डॉलर की मांग में भारी गिरावट आती है, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इसका विनाशकारी असर पड़ सकता है। वाशिंगटन जो अब तक असीमित मुद्रा छापकर और भारी कर्ज लेकर अपनी अर्थव्यवस्था चलाता रहा है, उसे अचानक अपने डॉलर के अवमूल्यन और रिकॉर्ड महंगाई का सामना करना पड़ेगा। इस अभूतपूर्व बदलाव ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में भारी अनिश्चितता फैला दी है, और दुनिया भर के निवेशक अमेरिकी बॉन्ड्स से पैसा निकालकर सुरक्षित संपत्तियों और उभरते बाजारों की ओर मोड़ रहे हैं।
भारत के लिए यह 'डी-डॉलराइजेशन' का दौर एक बेहद नाजुक लेकिन अत्यधिक फायदेमंद अवसर प्रस्तुत करता है। भारत ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE), रूस और कई अन्य मित्र देशों के साथ सीधे 'भारतीय रुपये' (INR) में व्यापार निपटाने के ऐतिहासिक समझौते किए हैं। इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर डॉलर खरीदने का बोझ घटा है और भारतीय रुपया अंतरराष्ट्रीय व्यापार में एक मजबूत और स्वीकार्य मुद्रा के रूप में अपनी नई पहचान बना रहा है।
भारत का अपना डिजिटल भुगतान नेटवर्क 'यूपीआई' (UPI) और 'रुपये-निपटान प्रणाली' अब कई देशों में स्वीकार की जा रही है, जिससे वैश्विक वित्तीय ढांचे में भारत की साख तेजी से बढ़ी है। हालाँकि, भारत इस मामले में बेहद व्यावहारिक है। भारत पूरी तरह से डॉलर का अंधाधुंध विरोध करके अमेरिका के साथ अपने विशाल व्यापारिक संबंधों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता, बल्कि वह अपनी मुद्रा को डॉलर के एक सुरक्षित और स्थिर विकल्प के रूप में धीरे-धीरे स्थापित कर रहा है।
भारत की कूटनीतिक नीति इस पूरे वैश्विक वित्तीय बदलाव में पूरी तरह से स्वतंत्र और गुटनिरपेक्ष है। चीन जहाँ इस अभियान को 'अमेरिका-विरोधी' (Anti-West) एजेंडे के रूप में भुनाकर युआन को थोपना चाहता है, वहीं भारत इसे केवल अपनी आर्थिक संप्रभुता और सुरक्षा का जरिया मानता है। भारत की यह दूरदर्शी रणनीति उसे इस नए बहुध्रुवीय आर्थिक दौर में एक निष्पक्ष, मजबूत और स्वतंत्र वित्तीय धुरी के रूप में स्थापित करती है।
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