दक्षिण-पूर्व एशिया से जियोपोलिटिक्स और अंतर्राष्ट्रीय अपराध का एक ऐसा रोंगटे खड़े कर देने वाला सच सामने आया है, जिसने पूरी दुनिया के सुरक्षा तंत्र को झकझोर कर रख दिया है। म्यांमार की सीमाओं और गृहयुद्ध से प्रभावित इलाकों में चल रहे कुख्यात 'टेलीकॉलिंग स्कैम सेंटर्स' और मानव तस्करी नेटवर्क पर चीन और क्षेत्रीय देशों की कड़ी कार्रवाई के बाद अदालतों ने मुख्य सरगनाओं को मौत की सजा सुना दी है। यह केंद्र केवल छोटे-मोटे वित्तीय फ्रॉड नहीं, बल्कि एआई-आधारित डीपफेक, जबरन वेश्यावृत्ति, मानव तस्करी और दुनिया भर के नागरिकों से अरबों डॉलर लूटने के अंतर्राष्ट्रीय अड्डे बन चुके थे।
इन स्कैम कंपाउंड्स का नेटवर्क इतना विशाल और जटिल था कि इसके तार कई देशों की भ्रष्ट सैन्य एजेंसियों, अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक गिरोहों और डार्क वेब के सौदागरों से जुड़े हुए थे। निर्दोष युवाओं को नौकरी का झांसा देकर इन अड्डों पर लाया जाता था और फिर उनसे बंदूक की नोक पर दुनिया भर के लोगों को ठगने का काम कराया जाता था। मना करने पर उनकी हत्या कर दी जाती थी।
इस अंतर्राष्ट्रीय रैकेट का पर्दाफाश होने से यह साफ हो गया है कि अस्थिर और युद्धग्रस्त देश किस तरह वैश्विक अपराध और साइबर-आतंकवाद की नर्सरी बनते जा रहे हैं। सीमा पार से संचालित होने वाले ये नेटवर्क अब कई देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए सीधे खतरा बन गए हैं।
भारतीय परिपेक्ष्य में यह मामला अत्यंत संवेदनशील और सीधा असर डालने वाला है। पिछले कुछ समय में सैकड़ों निर्दोष भारतीय युवाओं को आईटी नौकरी का लालच देकर म्यांमार, कंबोडिया और लाओस के इन्हीं स्कैम सेंटर्स में बंधक बनाया गया था, जिन्हें भारतीय विदेश मंत्रालय ने कड़ी मशक्कत के बाद रेस्क्यू कराया था। इसके अलावा, इन अड्डों से भारतीय नागरिकों और बैंकों को लक्षित करके एआई डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड के जरिए रोज करोड़ों रुपयों का चूना लगाया जा रहा था।
एशियाई क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की यह स्थिति यह साबित करती है कि जियोपोलिटिकल अस्थिरता का फायदा उठाकर क्रिमिनल सिंडिकेट अब आधुनिक तकनीक के बल पर देशों की आंतरिक सुरक्षा को ध्वस्त कर रहे हैं। इस पर कड़ा अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण समय की सबसे बड़ी मांग है।
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