अंतर्राष्ट्रीय समर में अब तक जमीन, समुद्र और हवा में ही सीमाएं तय की जाती थीं, लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की प्रचंड मांग ने जियोपोलिटिक्स को अंतरिक्ष की गहराइयों तक खींच लिया है। विश्व के प्रमुख टेक दिग्गजों और रक्षा एजेंसियों ने अंतरिक्ष में ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स और सुपरकंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थापना की नई होड़ शुरू कर दी है। वैश्विक समाचार पोर्टलों की रिपोट्र्स के अनुसार, एआई मॉडलों को प्रोसेस करने के लिए लगने वाली भारी बिजली और कूलिंग की समस्याओं से बचने के लिए अब सीधे पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में डेटा सेंटर भेजे जा रहे हैं।
यह महज एक व्यावसायिक होड़ नहीं है, बल्कि दुनिया की सैन्य रणनीतियों का नया अखाड़ा बन चुका है। उपग्रहों और अंतरिक्षीय डेटा सर्वरों को बिजली देने के लिए सौर ऊर्जा का असीमित उपयोग किया जा रहा है। हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अंतरिक्ष में बने इन डेटा सेंटर्स पर किसी भी प्रकार का सैन्य या साइबर हमला पृथ्वी के निकट अंतरिक्ष में मलबे (Space Debris) का ऐसा अंबार खड़ा कर देगा, जिससे भविष्य में किसी भी देश के लिए सैटेलाइट लॉन्च करना असंभव हो जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक अंतरिक्ष संधियों और बाह्य अंतरिक्ष के असैन्यीकरण के सिद्धांतों को पूरी तरह से कटघरे में खड़ा कर दिया है। महाशक्तियां अब यह सुनिश्चित करने में जुट गई हैं कि उनकी एआई क्षमताएं और महत्वपूर्ण डेटा सुरक्षित रहें। अंतरिक्ष में चल रही इस नई खींचतान ने अब उन देशों के कान खड़े कर दिए हैं जो अंतरिक्ष तकनीक में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
भारतीय परिपेक्ष्य में यह स्थिति दोधारी तलवार की तरह है। भारत के पास इसरो (ISRO) जैसी क्षमताएं हैं, जो लागत-प्रभावी अंतरिक्ष अभियानों के लिए जानी जाती हैं, लेकिन अंतरिक्षीय डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा भारत के अपने डिजिटल नेटवर्क और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधी चुनौती बन सकती है। भारत अगर समय रहते अपनी स्पेस-आधारित एआई परिसंपत्तियों और साइबर-रक्षा तंत्र को मजबूत नहीं करता, तो डेटा संप्रभुता के इस नए दौर में उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है।
पश्चिमी देश और उनके विरोधी गुट अंतरिक्ष में अपने अधिकार क्षेत्र की नई सीमाएं खींचने की फिराक में हैं। अगर अंतरिक्षीय एआई सर्वरों पर कोई हमला होता है, तो इससे ग्लोबल नेविगेशन, वित्तीय लेनदेन और रक्षा संचार ठप पड़ सकता है। यही कारण है कि दुनिया के तमाम थिंक-टैंक इसे 21वीं सदी का सबसे खतरनाक नया कूटनीतिक मोर्चा मान रहे हैं।
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