प्रशांत महासागर की गहराइयों से एक ऐसी डिजिटल तबाही की खबर आई है, जिसने हाइब्रिड वॉरफेयर (Hybrid Warfare) की खौफनाक हकीकत को दुनिया के सामने ला दिया है। ताइवान जलडमरूमध्य (Taiwan Strait) में समुद्र के नीचे बिछी प्रमुख सबमरीन इंटरनेट केबल्स को रहस्यमयी परिस्थितियों में एक साथ काट दिया गया है। इस हमले के बाद ताइवान का पूरी दुनिया से डिजिटल संपर्क लगभग कट गया है, जिससे ताइवान के वित्तीय बाजार, सेमीकंडक्टर निर्माण इकाइयां और सरकारी संचार नेटवर्क पूरी तरह ठप हो गए हैं।
ताइवानी रक्षा मंत्रालय और तकनीकी विशेषज्ञों ने इसे चीन द्वारा की गई एक 'डिजिटल नाकेबंदी' (Digital Blockade) करार दिया है। ताइवान पर सीधे मिसाइल या सैनिक हमले के बजाय, चीन की यह रणनीति 'ग्रे-ज़ोन वॉरफेयर' का हिस्सा मानी जा रही है, जिसके तहत दुश्मन देश को बिना एक भी गोली चलाये पूरी तरह से असहाय और अंधकार में धकेल दिया जाता है।
समुद्री इंटरनेट केबल्स के कटने से न केवल ताइवान, बल्कि पूरी दुनिया में आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) बाधित हो गई है। वैश्विक सेमीकंडक्टर और एआई चिप्स का 70 प्रतिशत से अधिक उत्पादन ताइवान में होता है, और इंटरनेट नेटवर्क ठप होने से दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों का कामकाज थम गया है।
भारतीय परिपेक्ष्य से यह घटना भारत के लिए अत्यंत गंभीर आर्थिक और तकनीकी सबक है। भारत वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और स्मार्टफोन निर्माण के लिए ताइवानी सेमीकंडक्टर्स पर अत्यधिक निर्भर है। यदि ताइवान का यह डिजिटल संकट लंबा खींचता है, तो भारत के 'मेक इन इंडिया' और टेक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर इसका सीधा और विनाशकारी असर पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, भारत की अपनी हजारों किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा भी सबमरीन केबल्स से जुड़ी हुई है, जिसके जरिए भारत का पूरा डिजिटल डेटा ट्रांसफर होता है। भारत को अपनी समुद्री केबल्स की नौसैनिक सुरक्षा को तुरंत अभेद्य बनाना होगा।
यह हमला साबित करता है कि 21वीं सदी के युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि समुद्र की गहराइयों में छिपे फाइबर ऑप्टिक केबल्स और सैटेलाइट्स पर लड़े जा रहे हैं।
यदि ताइवान को जल्द ही वैश्विक नेटवर्क से नहीं जोड़ा गया, तो वैश्विक बाजार में एआई और आईटी सेक्टर का सबसे बड़ा महा-मंदी का दौर शुरू हो सकता है।
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