रूस ने अपनी पश्चिमी सीमा और बेलारूस से सटे इलाकों में अपनी सामरिक परमाणु ताकतों का नया अभ्यास शुरू कर दिया है। क्रेमलिन के इस रणनीतिक कदम ने नाटो (NATO) और पूरे यूरोपीय संघ में खलबली मचा दी है। मॉस्को का यह कदम पश्चिमी देशों द्वारा दी जा रही सैन्य सहायता के जवाब में देखा जा रहा है।
नाटो महासचिव ने इस कदम को "गैर-जिम्मेदाराना और भड़काऊ" करार देते हुए अपनी पूर्वी सीमाओं पर त्वरित प्रतिक्रिया बल की तैनाती बढ़ाने की घोषणा की है। पोलैंड, रोमानिया और बाल्टिक देशों ने अपनी सीमाओं पर सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दी है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में इस मुद्दे को लेकर तीखी बहस देखने को मिली है। वाशिंगटन और लंदन ने चेतावनी दी है कि परमाणु हथियारों की किसी भी तरह की धमकी का करारा जवाब दिया जाएगा। कूटनीतिक रास्ते लगभग बंद होते दिख रहे हैं और दोनों पक्षों के बीच तनाव चरम पर है।
यूरोप के बाजारों में इस अप्रत्याशित सैन्य गतिविधि के कारण भारी अनिश्चितता छा गई है। आम नागरिकों के बीच भय का माहौल है और कई देशों में बंकरों व आपातकालीन तैयारियों की समीक्षा की जा रही है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य: भारत लगातार इस पूरे मामले में शांति, कूटनीति और बातचीत का पक्षधर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कहा है कि "यह युद्ध का युग नहीं है।" भारत का मानना है कि परमाणु बयानबाजी वैश्विक सुरक्षा के लिए अत्यंत खतरनाक है और सभी पक्षों को तुरंत वार्ता की मेज पर लौटना चाहिए।
भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए रूस और पश्चिमी देशों, दोनों के साथ निरंतर संवाद में है। नई दिल्ली का प्रयास है कि इस संघर्ष का असर वैश्विक दक्षिण (Global South) के गरीब और विकासशील देशों पर न पड़े, जो पहले से ही खाद्य और ईंधन संकट का सामना कर रहे हैं।
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