लैटिन अमेरिका के 'लिथियम ट्रायंगल' (चिली, अर्जेंटीना और बोलीविया) में दुनिया की बहुराष्ट्रीय कंपनियों और महाशक्तियों के बीच इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बैटरी बनाने वाले इस जादुई खनिज को हथियाने के लिए भयंकर आर्थिक और कूटनीतिक संघर्ष शुरू हो गया है। हाल ही में बोलीविया की सरकार ने खनन अनुबंधों को लेकर एक विवादित फैसला लिया है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला हिल गई है।
पश्चिमी देशों की बड़ी टेक और ऑटोमोबाइल कंपनियों ने आरोप लगाया है कि कुछ बाहरी देश इस क्षेत्र में अनुचित प्रभाव डालकर आपूर्ति श्रृंखला को एकाधिकार (Monopoly) में बदलने की साजिश रच रहे हैं। इसके कारण लैटिन अमेरिकी देशों की स्थानीय राजनीति में भारी उबाल आ गया है।
लिथियम की इस अंधी दौड़ ने स्थानीय आदिवासी समुदायों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं को सड़कों पर ला दिया है, जिनका कहना है कि अंधाधुंध खनन से उनके जल संसाधनों और पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुँच रही है। कई जगहों पर खनन परियोजनाओं के खिलाफ बड़े विरोध प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं।
वैश्विक वाहन निर्माताओं के लिए लिथियम की यह किल्लत भविष्य के उत्पादन लक्ष्यों के लिए एक बड़ा संकट बनती जा रही है, जिससे तकनीक और बाजार दोनों स्तरों पर उथल-पुथल मची हुई है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य: भारत अपनी हरित ऊर्जा (Green Energy) और इलेक्ट्रिक वाहन क्रांति के लक्ष्य को तेजी से हासिल करने के लिए लिथियम और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के आयात पर काम कर रहा है। भारत सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों ने हाल के वर्षों में लैटिन अमेरिकी देशों के साथ लिथियम ब्लॉकों के अधिग्रहण के लिए समझौते किए हैं। वैश्विक स्तर पर मची इस खनिजों की जंग के बीच भारत अपनी आपूर्ति सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर बेहद सक्रिय है।
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