राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कें एक बार फिर से ऐतिहासिक राजनीतिक हलचल और जनसैलाब की गवाह बनी हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं के विरोध में विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' (INDIA) ने दिल्ली में विशाल 'मार्च फॉर डेमोक्रेसी' (March for Democracy) निकाला। कांग्रेस नेता राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी वाड्रा सहित कई प्रमुख विपक्षी दिग्गजों की अगुआई में निकले इस मार्च ने देश के राजनीतिक तापमान को अचानक चरम पर पहुँचा दिया है।
कॉन्स्टिट्यूशन क्लब से शुरू होकर देश की सर्वोच्च अदालत और निर्वाचन सदन की ओर जाने वाले इस मार्च को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने मध्य दिल्ली और लुटियंस जोन में लोहे के कड़े बैरिकेड्स और भारी सुरक्षा बल तैनात कर रखा था। हालाँकि, हजारों की संख्या में एकत्र हुए कार्यकर्ताओं और युवा नेताओं का उत्साह इतना अधिक था कि उन्होंने कई जगहों पर सुरक्षा घेरों को तोड़ते हुए आगे बढ़ने का प्रयास किया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तीखी बहस, धक्का-मुक्की और झड़पें देखने को मिलीं। पुलिस ने कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए वाटर कैनन और बल प्रयोग किया।
विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि देश में निष्पक्ष चुनाव प्रणाली की रीढ़ कहे जाने वाले चुनाव आयोग (ECI) की साख और स्वायत्तता पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है। राहुल गांधी ने प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि यह लड़ाई किसी राजनीतिक पद या सत्ता की नहीं, बल्कि भारत के 'संविधान की रक्षा' और नागरिकों के 'मताधिकार को चोरी होने से बचाने' की लड़ाई है। विपक्ष का आरोप है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की आड़ में वास्तविक और वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से मनमाने ढंग से हटाए जा रहे हैं, जो लोकतंत्रीय व्यवस्था पर सीधा हमला है।
इस बड़े प्रदर्शन के समानांतर, विपक्षी नेताओं और जन-संगठनों ने एक प्रतिनिधिमंडल के रूप में भारत के सर्वोच्च न्यायालय का भी रुख किया। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में चुनाव आयोग द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे सॉफ्टवेयर (ERONET) और मतदाता सूचियों के डेटा संशोधन के सभी लॉग (Access Logs) सार्वजनिक करने तथा इस पुनरीक्षण प्रक्रिया की निष्पक्ष न्यायिक जांच की मांग की गई है। संसद से लेकर सड़कों तक इस मुद्दे पर गतिरोध इतना बढ़ गया कि हालिया दिनों में संसद की कार्यवाही में भी भारी हंगामा देखने को मिला।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने विपक्ष के इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे 'राजनीतिक रूप से प्रेरित' करार दिया है। सत्ता पक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त और संवैधानिक संस्था है, और मतदाता सूचियों को पारदर्शी तथा अद्यतन बनाने का काम पूरी तरह से नियमानुसार और वैध तरीके से किया जा रहा है। बीजेपी प्रवक्ताओं ने कहा कि चुनाव में अपनी संभावित हार से बौखलाकर विपक्ष अब संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा पर सवाल उठा रहा है और देश में अनावश्यक अशांति फैलाने की कोशिश कर रहा है।
राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण:
यह 'मार्च फॉर डेमोक्रेसी' इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश की राजनीति में अब 'चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता' एक केंद्रीय और बेहद संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। युवाओं, छात्र संगठनों (जैसे NSUI, AISA) और नागरिक समाज की सक्रिय भागीदारी ने इस आंदोलन को केवल एक पार्टी-विशेष का प्रदर्शन न बनाकर एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप दे दिया है। आने वाले महीनों में होने वाले विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुआ यह आक्रामक प्रदर्शन यह दर्शाता है कि विपक्ष अब इस मुद्दे पर पीछे हटने के मूड में बिल्कुल नहीं है। यह जनसैलाब आने वाले समय में देश के राजनीतिक समीकरणों और संस्थागत जवाबदेही की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
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