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चौराहे पर भारत: ईरान-इज़राइल संघर्ष में फंसे चाबहार और INSTC

ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक रणनीतिक परिदृश्य में गहरी हलचल मचा दी है, जिसके प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं हैं। इस संघर्ष से सबसे अधिक प्रभावित देशों में भारत भी है, जिसकी दीर्घकालिक आर्थिक और भू-राजनीतिक आकांक्षाएं इस क्षेत्र की स्थिरता पर टिकी हुई हैं—विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर (INSTC) जैसे दो महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर।

आकांक्षा शर्मा
आकांक्षा शर्मा
20 Jun 2025
Solar farm during sunset

ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक रणनीतिक परिदृश्य में गहरी हलचल मचा दी है, जिसके प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं हैं। इस संघर्ष से सबसे अधिक प्रभावित देशों में भारत भी है, जिसकी दीर्घकालिक आर्थिक और भू-राजनीतिक आकांक्षाएं इस क्षेत्र की स्थिरता पर टिकी हुई हैं—विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर (INSTC) जैसे दो महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर।



तनाव बढ़ने के साथ, भारत को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं की रक्षा करते हुए एक अत्यंत संवेदनशील कूटनीतिक संतुलन साधना पड़ रहा है, ताकि मध्य एशिया, रूस और आगे तक उसकी कनेक्टिविटी का सपना सुरक्षित रह सके।



चाबहार: अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत का रणनीतिक प्रवेश द्वार



ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत का निवेश केवल एक वाणिज्यिक परियोजना नहीं है; यह चीन के बढ़ते प्रभाव—विशेषकर चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) और ग्वादर बंदरगाह—के विरुद्ध एक रणनीतिक जवाब है।

2017 से भारत, ईरान और अफगानिस्तान के त्रिपक्षीय समझौते के तहत संचालित चाबहार भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान से जोड़ता है और मध्य एशिया से व्यापार और सुरक्षा संवाद बढ़ाने का माध्यम बनता है।



लेकिन अब, जब ईरान खुद एक बड़े क्षेत्रीय टकराव के केंद्र में आ गया है—हवाई हमले, प्रॉक्सी मिलिशिया, और खाड़ी क्षेत्र का ध्रुवीकरण मिलकर—तो चाबहार की स्थिरता और सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। किसी भी प्रकार का बुनियादी ढांचे पर हमला या पश्चिमी प्रतिबंधों में वृद्धि, भारत की इस परियोजना को बाधित कर सकते हैं।



INSTC: संकट के बीच एक व्यापारिक जीवनरेखा



अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर (INSTC) भारत की रणनीतिक कनेक्टिविटी नीति का एक और स्तंभ है। यह मल्टीमॉडल कॉरिडोर मुंबई को ईरान और कैस्पियन सागर होते हुए मास्को से जोड़ता है, जिससे व्यापार की लागत और समय दोनों में कमी आती है।



INSTC में ईरान की भौगोलिक स्थिति इसे अपरिहार्य बनाती है। लेकिन इज़राइल-ईरान युद्ध से यह मार्ग भी संकट में आ गया है। हवाई क्षेत्र का बंद होना, मालवाहन मार्गों पर हमले की आशंका, और ईरान पर लगे प्रतिबंध इस कॉरिडोर की प्रभावशीलता को बाधित कर सकते हैं। साथ ही, यह पूरा मार्ग ईरान की रेलवे, सड़क और बंदरगाह जैसी अधोसंरचना पर निर्भर करता है, जो इसे अस्थिरता या राजनयिक टूट से बेहद संवेदनशील बनाता है।



भारत की संतुलनकारी कूटनीति



इस संकट पर भारत की प्रतिक्रिया उसकी “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति को दर्शाती है। एक ओर भारत और इज़राइल के बीच गहरे रक्षा और खुफिया संबंध हैं, तो दूसरी ओर ईरान के साथ सांस्कृतिक, ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी भी रही है—हाल ही में चाबहार के दीर्घकालिक विकास के समझौते की पहल इसका प्रमाण है।



अब तक भारत ने इस टकराव में किसी पक्ष को समर्थन नहीं दिया है और तनाव घटाने की अपील की है। लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष गहराता है, पश्चिम—विशेषकर अमेरिका—द्वारा ईरान से दूरी बनाने का दबाव बढ़ सकता है, और भारत की यह तटस्थता कसौटी पर आ सकती है।



भारत की रूस से हालिया व्यापारिक निकटता भी इस समीकरण को प्रभावित करती है। INSTC के माध्यम से रूस वैकल्पिक व्यापार मार्गों की ओर देख रहा है और भारत भी इसमें गहरी रुचि रखता है। साथ ही, ईरान भारत का ऐसा भागीदार है जिसके ज़रिए वह तालिबान-शासित अफगानिस्तान से संवाद स्थापित करता है—बिना उसे औपचारिक मान्यता दिए।



कनेक्टिविटी की रणनीतिक सियासत



भारत के ये कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स सिर्फ व्यापार के मार्ग नहीं हैं, ये रणनीतिक उपकरण हैं। जब चीन अपना बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (BRI) आक्रामक रूप से बढ़ा रहा है, भारत के विकल्प—जैसे चाबहार और INSTC—एक अधिक समावेशी, संप्रभुता-सम्मानजनक विकास मॉडल प्रस्तुत करते हैं।



इन मार्गों को सुरक्षित रखने से भारत की ऊर्जा और व्यापार तक पहुंच तो मजबूत होती ही है, साथ ही वह शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स जैसे वैश्विक मंचों पर एक मज़बूत भागीदार के रूप में उभरता है। पश्चिम एशिया में अस्थिरता इन सपनों को पटरी से उतार सकती है—और यह जोखिम केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक है।



 तूफ़ान में भारत की रणनीति



जैसे-जैसे ईरान-इज़राइल संघर्ष आगे बढ़ता है, भारत के चाबहार और INSTC में निवेश असमंजस में झूल रहे हैं। ये केवल व्यापारिक परियोजनाएं नहीं हैं—बल्कि भारत की क्षेत्रीय पकड़, राजनयिक विश्वसनीयता, और चीन के विकल्प प्रस्तुत करने की क्षमता से जुड़े हुए हैं।



भारत को अब ज़रूरत है कुशल कूटनीति, मजबूत आर्थिक रणनीति, और दूरदर्शी संयम की—ताकि वह इस उथल-पुथल के बीच भी अपने निवेश और भू-संपर्क के सपनों को सुरक्षित रख सके।



आकांक्षा शर्मा कल्ट करंट की प्रशिक्षु पत्रकार है। आलेख में व्यक्त विचार उनके

निजी हैं और कल्ट करंट का इससे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।