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होर्मुज में बारूद, भारत में हड़कंप

फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जंग की भीषण आग भड़क उठी है। अंतर्राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के अनुसार, तेहरान और अमेरिकी-इज़राइली नौसेना बल के बीच सीधी मुठभेड़ में कई मालवाहक जहाजों और टैंकरों को निशाना बनाया गया है

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
15 Oct 2026
Solar farm during sunset

फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जंग की भीषण आग भड़क उठी है। अंतर्राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के अनुसार, तेहरान और अमेरिकी-इज़राइली नौसेना बल के बीच सीधी मुठभेड़ में कई मालवाहक जहाजों और टैंकरों को निशाना बनाया गया है। मिसाइलों और ड्रोन हमलों के कारण जलडमरूमध्य में कई कमर्शियल कार्गो शिप डूब गए हैं, जिससे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग पर जहाजों की आवाजाही लगभग पूरी तरह ठप पड़ गई है। ईरान ने दोटूक चेतावनी जारी की है कि जब तक वाशिंगटन उसकी शर्तें नहीं मानता, वह पीछे नहीं हटेगा।  

इस रणनीतिक जलमार्ग के ठप होने का असर सिर्फ वैश्विक बाजारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इस रूट पर एक झंडे वाले टैंकर पर ड्रोन हमले के बाद लापता हुए चालक दल में दो भारतीय नाविक भी शामिल हैं। ओमान के तटीय जलक्षेत्र में हुए इस हमले के बाद नाविकों के परिवारों में कोहराम मच गया है। भारतीय तटरक्षक बल और विदेश मंत्रालय लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और बचाव कार्य के लिए कूटनीतिक दबाव बना रहे हैं।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भारत की ऊर्जा सुरक्षा का दिल माना जाता है। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है और उसका एक बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर भारतीय बंदरगाहों तक पहुँचता है। अगर यह जलमार्ग लंबे समय के लिए बंद होता है, तो भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छू सकते हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें घरेलू मोर्चे पर महंगाई को बेकाबू कर सकती हैं, जिससे आम आदमी की जेब पर सीधा डाका पड़ेगा।  

केवल तेल ही नहीं, बल्कि उर्वरक (फर्टिलाइजर) की आपूर्ति भी इस संकट की वजह से रुक गई है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने चेतावनी जारी की है कि यदि होर्मुज से उर्वरकों की ढुलाई तुरंत शुरू नहीं हुई, तो वैश्विक स्तर पर कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आएगी। भारत के लिए यह दोहरा झटका है, क्योंकि रबी फसलों की बुवाई के मौसम में खाद की किल्लत भारतीय किसानों की कमर तोड़ सकती है और खाद्य महंगाई का नया संकट पैदा कर सकती है।

जियोपॉलिटिकल विश्लेषकों का मानना है कि नई दिल्ली को अब अपनी कूटनीतिक गुटनिरपेक्षता की सबसे बड़ी परीक्षा से गुजरना होगा। एक तरफ अमेरिका और इज़राइल का दबाव है, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ भारत के सदियों पुराने व्यापारिक और चाबहार पोर्ट से जुड़े हित हैं। अगर भारत ने मध्यस्थता कर इस जलमार्ग को सुरक्षित नहीं कराया, तो भारतीय शेयर बाजार से लेकर आम नागरिक की रसोई तक, हर जगह इस समुद्री युद्ध का भीषण असर दिखाई देगा।  

दुनिया की नजरें अब नई दिल्ली के रुख पर टिकी हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय के रणनीतिकार लगातार आपातकालीन बैठकें कर रहे हैं ताकि खाड़ी में फंसे हजारों भारतीय नागरिकों और जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। यह जंग अब सिर्फ अमेरिका और ईरान का मुद्दा नहीं रही, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था और आम इंसान के अस्तित्व से सीधे जुड़ चुकी है।  

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