इराक की राजधानी बगदाद से आई एक बड़ी राजनीतिक खबर ने मध्य पूर्व के सत्ता संतुलन में अचानक बहुत बड़ा फेरबदल कर दिया है। इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी ने सऊदी अरब की अपनी पहली आधिकारिक यात्रा के दौरान रियाद में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाकात की और ऐतिहासिक घोषणा की। इराकी प्रधानमंत्री ने दोटूक शब्दों में कसम खाई है कि उनकी सरकार किसी भी स्थिति में इराक की सरजमीं का इस्तेमाल सऊदी अरब या अन्य खाड़ी देशों पर हमलों के लिए नहीं होने देगी।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब हूती विद्रोहियों और ईरान समर्थक लड़ाकों द्वारा इराक की धरती से सऊदी अरब और उसके हवाई अड्डों को निशाना बनाए जाने के लगातार आरोप लग रहे थे। इराक का यह रुख सऊदी अरब के लिए एक बहुत बड़ी कूटनीतिक राहत बनकर आया है, जो लंबे समय से अपनी उत्तरी सीमाओं से होने वाले ड्रोन और मिसाइल हमलों से परेशान था। बगदाद का यह ऐलान इस बात का साफ संकेत है कि इराक अब तेहरान के भारी दबाव से खुद को मुक्त कर एक स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति अपनाना चाहता है।
क्राउन प्रिंस एमबीएस और अल-जैदी के बीच हुई इस मुलाकात ने खाड़ी क्षेत्र में नए सैन्य और सुरक्षा गठजोड़ की नींव रख दी है। इराक अब अपनी सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सऊदी अरब के साथ खुफिया जानकारी साझा (Intelligence Sharing) करेगा। ईरान समर्थित उग्रवादी गुटों (जैसे कताइब हिज्बुल्लाह) के लिए यह बहुत बड़ा झटका है, क्योंकि अब तक वे इराक को एक सुरक्षित ठिकाने की तरह इस्तेमाल कर रहे थे। इराकी सरकार का यह सख्त रवैया पूरे अरब जगत में एक नया मील का पत्थर साबित हो सकता है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में, बगदाद और रियाद का यह करीब आना बेहद राहत देने वाली और सकारात्मक खबर है। भारत के लाखों नागरिक सऊदी अरब और इराक दोनों ही देशों में काम करते हैं। अगर इराक और सऊदी अरब के बीच सैन्य समन्वय बढ़ता है, तो खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता आएगी और भारतीय प्रवासियों का जीवन व रोजगार सुरक्षित रहेगा। इसके अलावा, भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा इराक और सऊदी अरब दोनों से ही मिलता है।
विदेश नीति के नजरिए से देखा जाए तो भारत हमेशा से ही मध्य पूर्व में शांति और स्थिरता का समर्थक रहा है। भारत के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री लगातार खाड़ी देशों के साथ सुरक्षा और आर्थिक साझेदारी को मजबूत करने में जुटे हैं। इराक का यह फैसला मध्य पूर्व को एक चौतरफा युद्ध की आग में जलने से बचा सकता है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था और खाड़ी से आने वाले अरबों डॉलर के रेमिटेंस (Remittance) के लिए बेहद सुखद संकेत है।
बगदाद के इस ऐतिहासिक पासा पलटने से तेहरान के खेमे में सन्नाटा छा गया है। क्या इराक सचमुच अपने देश से सक्रिय खतरनाक मिलिशिया गुटों पर नकेल कस पाएगा, या फिर यह घोषणा केवल कूटनीतिक जुमलेबाजी बनकर रह जाएगी? खाड़ी की भावी शांति अब इस बात पर निर्भर करेगी कि इराकी सेना अपनी इस कसम को जमीन पर किस हद तक लागू कर पाती है।
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