मध्य एशिया का रणनीतिक भू-भाग एक बार फिर वैश्विक शक्तियों की शतरंज का नया अखाड़ा बन गया है। दुशांबे में आयोजित हो रहे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के राष्ट्राध्यक्षों के सम्मेलन ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। चीन और रूस के दबदबे वाले इस मंच पर भारत ने अपनी ऐसी रणनीतिक चाल चली है जिसने बीजिंग के रणनीतिकारों के पसीने छुड़ा दिए हैं।
ताजिकिस्तान की राजधानी में जुट रहे नेताओं के बीच भारत ने व्यापार, निवेश, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल कनेक्टिविटी पर केंद्रित एक मजबूत और वैकल्पिक एजेंडा पेश किया है। चीन की विवादित 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के मुकाबले भारत ने पारदर्शी और संप्रभुता का सम्मान करने वाले कनेक्टिविटी मॉडल्स को प्राथमिकता देने पर जोर दिया है।
चीन लंबे समय से मध्य एशियाई देशों को अपने कर्ज के जाल में फंसाकर उनका प्राकृतिक संसाधन निचोड़ने की नीति पर चल रहा था। लेकिन भारत की बढ़ती मौजूदगी ने इन देशों को एक बहुआयामी और सुरक्षित विकल्प प्रदान कर दिया है।
भारतीय परिपेक्ष्य में, मध्य एशिया भारत के ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार विस्तार का प्रमुख केंद्र है। भारत का UPI और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) मॉडल अब SCO के सदस्य देशों के बीच बेहद लोकप्रिय हो रहा है। भारत इन देशों के साथ मिलकर लॉजिस्टिक्स और वैकल्पिक फिनटेक कॉरिडोर स्थापित कर रहा है।
इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) और चाबहार पोर्ट के जरिए मध्य एशिया तक भारतीय सामानों की सीधी पहुंच अब हकीकत बन रही है। इससे न केवल भारत का व्यापार समय और लागत में आधा रह जाएगा, बल्कि पाकिस्तान को दरकिनार कर भारत सीधे यूरो-एशिया में अपनी धाक जमाएगा।
नई दिल्ली की इस आक्रामक और संतुलित कूटनीति ने साबित कर दिया है कि SCO अब केवल रूस और चीन का अखाड़ा नहीं रहा, बल्कि भारत के नेतृत्व में यह मंच एक बहुध्रुवीय और निष्पक्ष क्षेत्रीय संतुलन बनाने की ओर अग्रसर है।
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