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ऋण, जलवायु और शक्ति: विभाजित विश्व से जूझता G20

16 जुलाई को दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन में G20 सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों की बैठक आयोजित हुई। इस सत्र का फोकस वैश्विक ऋण पुनर्गठन, जलवायु वित्त पोषण और व्यापार पर था। मेज़बान देश के रूप में, दक्षिण अफ्रीका ने चर्चा को वैश्विक दक्षिण (Global South) से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर केंद्रित किया, जिनमें सार्वभौमिक ऋण बोझ, सतत विकास और बहुपक्षीय वित्तपोषण की भविष्य की दिशा शामिल रही।

धनिष्ठा डे
धनिष्ठा डे
17 Jul 2025
Solar farm during sunset

16 जुलाई को दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन में G20 सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों की बैठक आयोजित हुई। इस सत्र का फोकस वैश्विक ऋण पुनर्गठन, जलवायु वित्त पोषण और व्यापार पर था। मेज़बान देश के रूप में, दक्षिण अफ्रीका ने चर्चा को वैश्विक दक्षिण (Global South) से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर केंद्रित किया, जिनमें सार्वभौमिक ऋण बोझ, सतत विकास और बहुपक्षीय वित्तपोषण की भविष्य की दिशा शामिल रही।



ऋण पुनर्गठन इस बैठक का केंद्रीय विषय था। विश्व बैंक के अनुसार, 60% निम्न-आय वाले देश या तो गंभीर ऋण संकट का सामना कर रहे हैं या उसके अत्यधिक जोखिम में हैं। ज़ाम्बिया, घाना और इथियोपिया जैसे अफ्रीकी देश G20 के "कॉमन फ्रेमवर्क" के तहत ऋण पुनर्गठन में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। ज़ाम्बिया के मामले में कुछ प्रगति के बावजूद, पश्चिमी ऋणदाताओं और चीन के बीच समन्वय की कमी और विलंब इस तंत्र की प्रभावशीलता को सीमित करते हैं। अफ्रीकी वित्त अधिकारियों ने चिंता जताई कि मौजूदा ऋण राहत प्रणालियाँ बहुत धीमी हैं और पारदर्शिता से वंचित हैं। उन्होंने यह भी इंगित किया कि वैश्विक वित्तीय संस्थानों में निर्णय-निर्माण का नियंत्रण ऋणदाता देशों के हाथों में केंद्रित है, जिससे शक्ति असंतुलन पैदा होता है।



अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक ने G20 से अपील की कि वे कॉमन फ्रेमवर्क की पूर्वानुमेयता बढ़ाएं—इसके लिए स्पष्ट प्रक्रिया समयसीमा, निजी ऋणदाताओं की अनिवार्य भागीदारी, और बेहतर ऋण डेटा पारदर्शिता सुनिश्चित करना आवश्यक बताया गया। हालांकि बैठक में कोई औपचारिक सुधार स्वीकृत नहीं हुए, लेकिन IMF-विश्व बैंक की अक्टूबर में मारकेश में होने वाली वार्षिक बैठक से पहले सुझाव प्रस्तुत करने हेतु एक तकनीकी कार्यसमूह गठित किया गया।



जलवायु वित्त पोषण भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा, विशेष रूप से इस संदर्भ में कि अमेरिका ने अपनी अंतरराष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं को कम कर दिया है। इस कदम ने "जस्ट एनर्जी ट्रांज़िशन पार्टनरशिप्स (JETPs)" जैसी योजनाओं की सफलता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है, जिनका उद्देश्य विकासशील देशों को जीवाश्म ईंधनों से दूर ले जाना है। 2021 में COP26 के दौरान दक्षिण अफ्रीका के साथ शुरू हुई पहली JETP योजना में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और यूरोपीय संघ ने मिलकर $8.5 बिलियन का वादा किया था। लेकिन अब तक केवल 5% से भी कम राशि वितरित की गई है, और कार्यान्वयन की गति बहुत धीमी रही है।



बैठक में स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDRs) के पुनः आवंटन पर भी चर्चा तेज हुई। दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील ने फिर से यह प्रस्ताव रखा कि संपन्न देशों के अप्रयुक्त SDRs में से $100 बिलियन को कमजोर अर्थव्यवस्थाओं को स्थानांतरित किया जाए। IMF द्वारा 2021 में SDRs का $650 बिलियन का ऐतिहासिक आवंटन किया गया था, लेकिन इसमें से केवल 5% से कुछ अधिक ही अफ्रीका को मिला। हालांकि फ्रांस और जर्मनी ने शासन संबंधी शर्तों के साथ सीमित पुनःआवंटन का समर्थन किया है, परंतु इन निधियों को बहुपक्षीय विकास बैंकों के माध्यम से चैनल करने पर अब तक G20 में सहमति नहीं बनी है।



भारत और ब्राज़ील ने ब्रेटन वुड्स संस्थानों में सुधार की ज़ोरदार मांग उठाई। भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि IMF और विश्व बैंक में मतदान अधिकार और बोर्ड प्रतिनिधित्व वर्तमान वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को प्रतिबिंबित नहीं करते, जबकि उभरती अर्थव्यवस्थाएँ अब वैश्विक GDP का 45% से अधिक योगदान देती हैं। उनके सुझावों में कोटा आवंटन में परिवर्तन और जलवायु-संवेदनशील देशों के लिए विशेष नकदी सुविधा (liquidity facility) की स्थापना शामिल थी।



इन मतभेदों के बावजूद, G20 ने बहुपक्षीयता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और तीन तकनीकी कार्य समूह गठित करने पर सहमति जताई—ऋण पारदर्शिता, जलवायु वित्त जुटाने, और वैश्विक वित्तीय शासन में सुधार पर ये समूह आगामी महीनों में रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे, जिन्हें वर्ष के अंत में रियो डी जनेरियो में होने वाले G20 शिखर सम्मेलन में प्रस्तुत किया जाएगा।



साइड बैठकों में एक और महत्वपूर्ण विषय रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़ी व्यापारिक खींचतान रही। बैठक से कुछ दिन पहले ही NATO महासचिव मार्क रुट्टे ने सुझाव दिया था कि जो देश रूस के साथ व्यापार जारी रखेंगे, उन पर 100% द्वितीयक शुल्क (secondary tariffs) लगाए जा सकते हैं। यह टिप्पणी G20 की औपचारिक चर्चा का हिस्सा नहीं थी, लेकिन भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे BRICS सदस्य देशों में इसे लेकर चिंता व्याप्त हो गई, क्योंकि ये देश रूस के साथ ऊर्जा और वस्तु व्यापार बनाए रखे हुए हैं।



केप टाउन की यह बैठक वर्तमान वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की मूलभूत सीमाओं को उजागर करती है। जलवायु संकट की बढ़ती तीव्रता, ऋण संकट की गहराई और अंतरराष्ट्रीय वादों पर घटते विश्वास के बीच, विकासशील देश अब केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि संरचनात्मक बदलावों की मांग कर रहे हैं—ऐसे बदलाव जो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को अधिक संतुलित और न्यायसंगत बना सकें।



धनिष्ठा डे कल्ट करंट की प्रशिक्षु पत्रकार है। आलेख में व्यक्त विचार उनके

निजी हैं और कल्ट करंट का इससे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।